खाद्य प्रणालियों का जलविज्ञानीय वास्तविकताओं के अनुरूप पुनःसंतुलन 

पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण

संदर्भ

  • विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट “पोषण और समृद्धि: एक रहने योग्य ग्रह पर 10 अरब लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए जल समाधान” में यह संरचनात्मक चिंता व्यक्त की है कि वैश्विक खाद्य प्रणाली मूलतः जलविज्ञानीय वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • विश्व बैंक का अनुमान है कि यदि अक्षमताएँ बनी रहती हैं तो वर्तमान कृषि जल प्रणालियाँ वर्ष 2050 तक केवल वैश्विक जनसंख्या के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए ही खाद्य उत्पादन को सतत रूप से समर्थन दे पाएंगी।
    • संकट का मूल कारण जल की पूर्ण कमी नहीं बल्कि कुप्रबंधन है।
  • भारत एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है—यह जल-संकटग्रस्त देश होते हुए भी जल-प्रधान फसलों का निर्यात करता है, जिससे “आभासी जल” का निर्यात होता है।
  • पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में भूजल का क्षरण प्रति वर्ष एक मीटर से अधिक की दर से हो रहा है।

ऊर्जा–जल–खाद्य संबंध 

  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपनी 2026 योजना तेल के आघातों से बचाव” में बल दिया है कि ऊर्जा व्यवधान शीघ्र ही खाद्य और जल संकट में परिवर्तित हो सकते हैं।
    • भारत लगभग 85–90% कच्चे तेल का आयात करता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा आघातों के प्रति संवेदनशील है।
  • भूजल सिंचाई ऊर्जा-प्रधान प्रक्रिया है, जो बिजली और डीज़ल पर निर्भर करती है।
    • ईंधन की बढ़ती कीमतें सिंचाई, परिवहन और खाद्य वितरण की लागत को बढ़ा देती हैं।
  • इस प्रकार, जल उपयोग की अक्षमताएँ सीधे ऊर्जा मांग को बढ़ाती हैं, जबकि ऊर्जा आगाहत खाद्य असुरक्षा और मुद्रास्फीति को और गंभीर बनाते हैं।

भारत में संकट के कारक

  • विकृत प्रोत्साहन संरचना: सिंचाई हेतु मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली भूजल दोहन की सीमांत लागत को लगभग शून्य कर देती है, जिससे अस्थिर और अत्यधिक पंपिंग होती है।
  • फसल पैटर्न असंतुलन: नीतिगत समर्थन तंत्र जल-प्रधान फसलों जैसे धान और गन्ने की खेती को उन क्षेत्रों में प्रोत्साहित करता है जो पारिस्थितिक दृष्टि से अनुपयुक्त हैं।
  • खंडित नीतिगत ढाँचा: जल, ऊर्जा और कृषि अलग-अलग विभागों द्वारा संचालित होते हैं, जिससे नीतिगत असंगति एवं अक्षमता उत्पन्न होती है।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
    • अनियमित मानसून, सूखा और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति कृषि चक्रों को बाधित कर रही है।
    • जब जलवायु दबाव ऊर्जा झटकों के साथ जुड़ता है तो खाद्य सुरक्षा के लिए संयुक्त जोखिम उत्पन्न होते हैं।

सतत प्रबंधन हेतु सरकारी पहल

  • राष्ट्रीय जल मिशन: जल संरक्षण, अपव्यय न्यूनतम करने और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने पर केंद्रित।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): सिंचाई कवरेज बढ़ाने और “प्रति बूंद अधिक फसल” सिद्धांत के माध्यम से जल उपयोग दक्षता सुधारने का लक्ष्य।
  • सूक्ष्म सिंचाई कोष: राज्यों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली विस्तार हेतु वित्तीय सहयोग।
  • अटल भूजल योजना: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सामुदायिक नेतृत्व वाली भूजल प्रबंधन योजना, जो व्यवहार परिवर्तन और स्थानीय भागीदारी के माध्यम से सतत उपयोग को बढ़ावा देती है।
  • पीएम-कुसुम योजना: सौर ऊर्जा चालित सिंचाई पंपों को प्रोत्साहित करती है, डीज़ल पर निर्भरता घटाती है और किसानों की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाती है।

आगे की राह

  • जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में जल-प्रधान फसलों से हटकर फसल विविधीकरण को लक्षित प्रोत्साहन और खरीद समर्थन के माध्यम से सक्रिय रूप से बढ़ावा देना।
  • ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सटीक सिंचाई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाना ताकि कृषि में जल उपयोग दक्षता सुधरे।
  • पीएम-कुसुम जैसी सरकारी योजनाओं को जल लेखांकन तंत्र और स्मार्ट उपयोग नियंत्रण जैसे सुरक्षा उपायों के साथ एकीकृत करना ताकि कम या शून्य सीमांत ऊर्जा लागत से उत्पन्न अति-उपयोग रोका जा सके।
  • मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करना, साथ ही एकीकृत डेटा प्रणाली और नियोजन प्रक्रियाओं को लागू करना, दीर्घकालिक स्थिरता एवं प्रभावी नीतिगत क्रियान्वयन के लिए आवश्यक होगा।

स्रोत: TH

 

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